विद्वान एम.एस.ए. राव का कहना है कि अहीरों की पहचान प्राचीन यादवों से करने के ऐतिहासिक साक्ष्य मौजूद हैं। इतिहासकार पी. एम. चंदोरकर साहित्यिक और पुरालेखीय दोनों स्रोतों का उपयोग करते हुए आधुनिक अहीरों की पहचान शास्त्रीय संस्कृत ग्रंथों के यादवों से करते हैं।
इतिहासकार टी पद्मजा अपनी पुस्तक टेम्पल्स ऑफ कृष्णा इन साउथ इंडिया: हिस्ट्री, आर्ट, एंड ट्रेडिशन्स इन तमिलनाडु में लिखते हैं, अहीरों को तमिल में अयार नाम से जाना जाता है, अहीरों ने तमिलनाडु में प्रवास किया और अपने राज्य स्थापित किए और ताम्रपत्र अनुदानों और शिलालेखों में इन अयार/अहीरों का उल्लेख है कि वे यदु/यादव वंश से हैं।
महाभारत में अहीर, गोप, गोपाल और यादव सभी पर्यायवाची हैं। महाकाव्यों और पुराणों में यादवों का अहीरों के साथ संबंध इस साक्ष्य से प्रमाणित होता है कि यादव साम्राज्य “अधिकांशतः अहीरों द्वारा बसा हुआ था”।
टॉलेमी जिस क्षेत्र को लरिके बताते हैं वह लगभग 80 ईस्वी में पेरीप्लस के दिनों में अभीरिया (अबीरिया) कहलाता था। गुजरात के यह आभीर अशोक के काल के राष्ट्रिक और महाभारत काल के यादव थे। इस क्षेत्र में अनेक बार गणतन्त्र प्रणाली अपनायी जाती रही है। महाभारत के काल में यहाँ यादवों के अंधक-वृष्णि और भोज गणतन्त्र थे, अशोक के काल में यहां राष्ट्रिक और भोज गणतंत्र थे और खारवेल के काल में रठिक और भोज गणतंत्र थे। समुद्रगुप्त के काल में यहाँ आभीर थे और पुराणों के अनुसार यहाँ सौराष्ट्र और अबन्ति–आभीरों के गणतंत्र थे। कुमारगुप्त प्रथम तथा स्कन्दगुप्त के काल में यहाँ पुष्यमित्र जनजाति के लोग थे। ये सब एक ही जाति के लोग थे जो अलग अलग काल खंडों में अलग अलग नाम से जाने गये।
आभीर-त्रैकुटक नामक एक ऐतिहासिक राजवंश ने ‘महाकाव्य’ और पुराणों में वर्णित हैहय यादवों से वंश का दावा किया।
जैन विद्वान हेमचन्द्राचार्य ने अपने द्याश्रय-काव्य में जूनागढ़ के पास वंथली में शासन करने वाले राजा ग्रहरिपु का वर्णन आभीर और यादव के रूप में किया है।[44] फिर, खानदेश जिले में कई प्राचीन अवशेष गवली (अभीर) राज के काल के माने जाते हैं। पुरातात्विक दृष्टिकोण से, इन्हें देवगिरि के यादवों के समय का माना जाता है। इसलिए लोकप्रिय धारणा के अनुसार, ये यादव आभीर थे।
